Tue , Nov 04 2025
मैंने डॉक्टर की राय को चुनौती दी। मुझे ऐसा करने का अधिकार था। मैं बच्चे का पिता था। मैं भी एक निर्णय पर पहुंचा और मैंने भी अपनी राय दी, परंतु मैंने अपनी राय को अपने दिमाग में ही सोचा, इसे अपने दिल तक ही रखा।
अपने दिल में मैं जानता था कि मेरा पुत्र सुनेगा भी और बोलेगा भी। किस तरह ? मुझे विश्वास था कि कोई न कोई तरीका तो होगा और मैं जानता था कि मैं यह तरीका ढूँढ़ लूँगा। मैंने अमर इमर्सन के इन शब्दों को याद किया.
हममें से हर एक के लिए मार्गदर्शन उपलब्ध है और केवल सुनने भर से हम सही शब्द सुन सकेंगे।"
मैं इस बारे में क्या कर सकता था ? किसी तरह मैंने एक ऐसा रास्ता खोज लिया जिससे मैं अपने बच्चे के मस्तिष्क में वही प्रबल इच्छा भर दूँ जो मेरे मस्तिष्क में थी इस बात की प्रवल इच्छा कि वह बिना कानों के भी सुनने के तरीके खोजने में जुटा रहे।
जैसे ही बच्चा इतना बड़ा हुआ कि वह मेरे साथ सहयोग कर सके, मैं पूरी तरह सुनने की प्रबल इच्छा को उसके दिमाग में भरने लगा
यह सारा चितन मेरे अपने मस्तिष्क में चलता रहा, परंतु मैंने किसी को भी यह बात नहीं बताई। हर दिन में खुद से किए गए वादे को दोहराता रहा कि मेरा पुत्र बहरा और गूँगा नहीं रहना चाहिए।
जब वह बड़ा हुआ और अपने आस-पास की चीज़ों को देखने लगा तो हमने पाया कि उसमें सुनने की थोड़ी शक्ति तो थी। जब वह उस उम्र में पहुँचा जब बच्चे आम तौर पर बोलना शुरू करते हैं, तो उसने बोलने की कोई कोशिश नहीं की, परंतु उसकी हरकतों से हम समझ जाते थे कि वह कुछ आवाज़ों को थोड़ा-बहुत सुन सकता था। मैं इतना ही तो जानना चाहता था। मुझे विश्वास था कि अगर वह जरा सा भी सुन सकता था, तो उसकी सुनने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। फिर ऐसा कुछ हुआ जिससे मुझे आशा बँधी। यह एक अनपेक्षित संयोग था।
हम एक रिकॉर्ड प्लेयर लाए। जब बच्चे ने इसका संगीत पहली बार सुना तो वह तो खुशी के मारे पागल हो गया और उसने उस मशीन पर कब्जा कर लिया। एक बार वह रिकॉर्ड प्लेयर के सामने खड़े होकर उसी रिकॉर्ड को दो घंटे तक सुनता रहा, और उसके दाँत उस मशीन के किनारे पर जकडे हुए थे। उसकी इस आदत का महत्व हमें कई वर्षों तक समझ में नहीं आया जब तक कि हमें ध्वनि के "बोन कडक्शन" के सिद्धांत के बारे में पता नहीं चला।
यह पता चलने के बाद कि वह मेरी आवाज़ को साफ सुन सकता है मैंने तत्काल उसके मस्तिष्क में सुनने और बोलने की इच्छा को भरना शुरू कर दिया। मुझे जल्दी ही यह जानकारी मिली कि बच्चे को बेडटाइम कहानियों में मजा आता है इसलिए मैंने ऐसी कहानियाँ लिखी जो उसे स्वावलंबन, कल्पनाशक्ति और सुनने तथा सामान्य बनने की तीव्र इच्छा विकसित करने का संदेश दे सकें।
खास तौर पर मैंने एक कहानी पर जोर दिया, जिसे मैं उसे बार-बार नए और नाटकीय अंदाज में बदल-बदलकर सुनाता रहा। में इस कहानी के द्वारा उसके मस्तिष्क में यह विचार बीज बोना चाहता था कि(उसकी शारीरिक स्थिति दुर्भाग्य नहीं है, बल्कि एक छुपा हुआ बहुमूल्य सौभाग्य है।)हालाँकि फिलॉसफी ने मुझे सिखाया है कि हर दुर्भाग्य अपने साथ उतने ही बड़े सौभाग्य का बीज लेकर आता है, परंतु सच कहूँ तो मुझे जरा भी एहसास नहीं था कि यह दुर्भाग्य किस तरह का सौभाग्य बन सकता है।
जब मैं पिछली बातें याद करता हूँ तो में अब यह देख सकता हूँ कि चूँकि मेरे पुत्र को मुझ पर विश्वास था इसलिए उसे इतने चमत्कारी परिणाम मिले। उसने बिना सवाल पूछे मेरी हर बात मानी। मैंने उसके दिमाग में यह विचार विठा दिया कि वह अपने बड़े भाई से ज्यादा लाभप्रद स्थिति में है और उसे कई तरीकों से लाभ मिलेगा। उदाहरण के तौर पर स्कूल में टीचर जब देखेंगे कि उसके कान नहीं हैं, तो इस वजह से वे उसकी तरफ अधिक ध्यान देंगे और उसके साथ असाधारण दयालुता से पेश आएँगे। और सचमुच टीचर्स ने ऐसा ही किया। मैंने उसके दिमाग में यह विचार भी बिठा दिया कि जब वह पेपर बेचने लायक बड़ा हो जाएगा (उसका बड़ा भाई पहले से ही पेपर बेचता था) तो उसे अपने भाई की तुलना में अधिक लाभ होगा, क्योंकि लोग उसके सामान के अधिक पैसे देंगे। जब लोग देखेंगे कि कान न होने के बावजूद वह इतना मेहनती और समझदार बच्चा है तो वे उसके साथ अतिरिक्त सहानुभूति रखेंगे।
जब वह सात साल का हुआ, तो उसने पहली बार इस बात का प्रमाण दिया कि उसके दिमाग में मेरे बोए गए बीज अब फल देने लगे हैं। कई महीनों तक उसने अखबार बेचने की इच्छा जाहिर की, परंतु उसकी माँ इस बात के लिए तैयार नहीं हुई और उन्होंने उसे यह कामकरने की अनुमति नहीं दी।
आखिरकार उसने इस मामले को अपने हाथ में ले लिया। एक दोपहर जब वह घर में अकेला था यानी नौकरों के सिवा वहां कोई नहीं था तो यह किचन की खिडकी से बाहर निकला जमीन पर कूदा और बाहर की तरफ चल पड़ा। उसने पड़ोस के जूते बनाने वाले से छह से की पंजी उधार ली. अखबार खरीदने में इस पूँजी का निवेश किया अखबार बेचे फिर से निवेश किया और देर शाम तक वह इसी तरह बार-बार निवेश करता रहा और अखबार बेचता रहा। आखिर अपने बहीखाते को सही करने के बाद और अपने बैंकर से लिए छह सेंट के उधार को वापस करने के बाद उसने अपना मुनाफा गिना- बयालीस सेट। जब हम रात को घर लौटे तो हमने देखा कि वह अपने बिस्तर पर गहरी नींद में सो रहा है और बयालीस सेंट उसकी मटठी में जकडे हुए हैं।
उसकी माँ ने उसकी मुट्ठी खोली सिक्के निकाले और रो पड़ी। यह भी होना था। अपने पुत्र की पहली सफलता पर रोना तो उचित नहीं था। मेरी प्रतिक्रिया बिलकुल विपरीत थी।
उसकी माँ ने उसके पहले व्यावसायिक अभियान में यह देखा कि एक बहरा सा बच्चा सड़कों पर जाकर पैसे कमाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहा था।
क्योंकि वह अपनी मर्जी से बिज़नेस में गया था और उसने सफलता हासिल की थी। इस सौदे से मुझे खुशी हुई क्योंकि इससे में जान गया कि उसने अब अपने आत्मविश्वास और सफलता का वह प्रमाण दे दिया था जो जीवन भर उसका साथ देगा।
छोटा बहरा बच्चा स्कूल पास कर गया, और बिना अपने टीचर्स के लेक्चर सुने कॉलेज भी पास कर गया। वह अपने टीचर्स की बात तभी सुन पता था जब वे पास में खड़े होकर ज़ोर से चिल्लाते थे वह मूक -बधिर बच्चों के स्कूल में पढ़ने नहीं गया हमने संकल्प कर लिया था कि वह एक सामान्य जीवन जिएगा और सामान्य बच्चों के साथ रहेगा। और हम इस फैसले पर डटे रहे. हालाँकि कई बार स्कूल के अधिकारियों में इस बारे में हमारी काफी बहस हुई।
जब वह हाई स्कूल में था, तो हमने बिजली से चलने वाले एक हियरिंग एड को आजमाकर देखा, परंतु उससे जरा भी फायदा नहीं हुआ।
कॉलेज में उसके आखिरी सप्ताह के दौरान एक ऐसी घटना हुई जो उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट साबित हुई। यह संयोग ही था कि उसे बिजली का एक और हियरिंग एड मिल गया, जो उसे बतौर ट्रायल भेजा गया था। वह अनमने ढंग से इसका परीक्षण करने के लिए तैयार हुआ, क्योंकि हियरिंग एड के मामले में वह पहले भी एक बार निराश हो चुका था। आखिरकार उसने उस यंत्र को उठाया और लापरवाही से अपने सिर पर जमा लिया, बैटरी को चालू किया और लो, जादू के एक झटके से वह सुनने लगा। जिंदगी भर से उसने आम लोगों की तरह सुनने का जो सपना देखा था वह सच हो गया। जीवन में पहली बार वह उतनी ही स्पष्टता से सुन पा रहा था जिस तरह से आम लोग सुनते हैं।
अपने हियरिंग एड की सफलता से अभिभूत होकर और अपनी बदली हुई दुनिया की खुशी का इजहार करने के लिए उसने फोन पर अपनी माँ से बात की और उसे उनकी आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। अगले दिन उसने क्लास में अपने प्रोफ़ेसरों की आवाज़ को भी साफ़ सुना और ऐसा जिंदगी में पहली बार हुआ था। पहली बार वह दूसरे लोगों के साथ बिना किसी बाधा के बातचीत कर सकता था और उसे कोई बात सुनाने के लिए दूसरों को ज़ोर से बोलने की अब कोई ज़रूरत नहीं रह गई थी। सचमुच, उसकी दुनिया बदल चुकी थी।
प्रबल इच्छा ने फल देना शुरू कर दिया था. परंतु जीत अभी पूरी नहीं हुई थी। बच्चे को अब भी एक निश्चित और प्रैक्टिकल ढूंढना था जिसके सहारे वह अपनी कमजोरी को ताकत में बदल
हालांकि उसे इस बात का एहसास नहीं था कि जो हासिल हुआ था वह कितना महत्वपुर्ण द्या. परंतु आवाज की दुनिया में पहली बार कदम रखते हुए उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था और उसने उस हियरिंग एड बनाने वाली कंपनी के निर्माता को एक पत्र लिखा जिसमें उसने पूरे उत्साह से अपना अनुभव बताया। उस पत्र में ऐसा कुछ था जिसकी वजह से कंपनी ने उसे न्यूयॉर्क आने का आमंत्रण दिया। जब वह वहाँ पहुंचा तो उसे फैक्टी में ले जाया गया और चीफ इंजीनियर को अपना अनुभव बताते समय उसके दिमाग में एक कल्पना, एक विचार, एक प्रेरणा आप इसे चाहे किसी भी नाम से पुकार लें काँध गई। इसी विचार के आवेग ने उसकी कमज़ोरी को ताक़त में, उसके कष्ट को संपत्ति में बदल दिया और इसी की वजह से हजारों लोगों के जीवन में सुख की रोशनी फैल गई।
इस विचार के आवेग का सारांश यह था उसने सोचा कि अगर वह बिना हियरिंग एड वाले लाखों बहरे लोगों तक अपनी बदली हुई दुनिया की कहानी पहुँचा सके तो वह उनकी मदद कर सकता है।
एक महीने तक उसने गहन शोध किया, जिस दौरान उसने हियरिंग एड के निर्माता के पूरे मार्केटिंग सिस्टम का विश्लेषण किया। उसने ऐसे तरीके खोजे जिनके द्वारा वह बहरे लोगों तक अपना संदेश पहुँचा सके। जब यह हो गया, तो उसने दो साल की योजना कागज़ पर बनाई, जो उसके विश्लेषण के परिणामों पर आधारित थी। जब उसने कंपनी के सामने अपनी योजना प्रस्तुत की तो उसेई तत्काल नौकरी दे दी गई ताकि वह अपनी महत्वाकांक्षा को सच साबित कर सके।
जब उसने यह काम शुरू किया तो उसने सपने में भी यह नहीं सोचा था कि वह हजारों बहरे लोगों के जीवन को आशा और राहत से भर देगा जो उसकी मदद के बिना हमेशा बहरे बने रहने के लिए अभिशप्त रहते।
मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि ब्लेयर पूरे जीवन बहरा और गूँगा ही बना रहता अगर उसकी माँ और मैने उसके मस्तिष्क को उस तरह के सौचे में नहीं ढाला होता।
जब मैंने उसके मन में प्रबल इच्छा का यह बीज बोया कि वह आम आदमी की तरह सुन और बोल सके, तो उस बीज के साथ एक ऐसा विचार भी गया। इसी विचार के कारण प्रकृति को एक पुल बनाना पडा और उसके मस्तिष्क तथा बाहरी दुनिया के बीच की मौन की खाई को पाटना पड़ा।
सच है। प्रबल इच्छा भौतिक रूप में आने के तरीके खोज ही लेती है। ब्लेयर ने यह इच्छा की कि सामान्य लोगों की तरह सुनने की शक्ति उसके पास हो और अब यह शक्ति उसके पास है। वह एक कमी के साथ पैदा हुआ था और उसे बड़ी आसानी से सड़क पर कुछ पेन्सिलों और एक टिन के डिब्बे के साथ भेजा जा सकता था
मैंने उसके बचपन में उसके दिमाग में जो छोटा "सफेद झूठ" डाल दिया था कि उसकी कमी दरअसल उसका सबसे बड़ा लाभ है, कि वह उसके कारण सफल हो सकता है, अब सच साबित हो गया था
प्लीज़ पसंद आए तो लाइक और शेयर जरूर करें
Leave a Reply